बुधवार, 6 अप्रैल 2011

याद आ गया वो यादगार पल

इस दिन और उस दिन में बहुत फर्क है। आज भारतीय क्रिकेट के बिना क्रिकेट को अधूरा माना जाता है। लेकिन जिस दौरान कपिल देव के नेतृत्व में 1983 में टीम इंडिया ने विश्वकप जीता था, उससे पहले विश्व में भारतीय क्रिकेट बहुत मायने नहीं रखता था। हां, विश्वकप जीतने के बाद भारतीय क्रिकेट को पहचान मिली। उस दौरान नंबर वन कहलाने वाली वेस्टइंडीज के विजयरथ को वहीं थाम दिया था। उसके बाद से वेस्टइंडीज आज तक विश्वकप जीतना तो दूर है, विश्वकप के फाइनल तक नहीं पहुंच पाई। कपिल देव की टीम में अधिकांश खिलाड़ी ऑलराउंडर थे। टीम में किसी को एक विशेष तकनीक के लिए नहीं पहचाना जाता था। ऐसा सिर्फ भारतीय टीम में नहीं लगभग सभी टीमें ऑलराउंडरों से सजी-धजी रहती थीं। 1983 में कुछेक घरों में ही टेलीविजन थे। लेकिन रेडियो पर 'आकाशवाणी' जिंदाबाद था। 83 से पहले के दो विश्वकप में टीम इंडिया की दशा दयनीय थी। उस वक्त कभी सोचा भी नहीं था कि भारत एकदम से उभर कर आएगी और विश्वकप लाएगी। 83 का विश्वकप टूर्नामेंट जब शुरू हुआ था तो लोगों में इतना चाव नहीं था। सब यही मानते थे कि हर बार की तरह भारत पराजित हो जाएगा, सो देखने सुनने से क्या फायदा। पर मैच दर मैच भारत की विजयी होती रही और क्रिकेट के प्रति भारतीयों की खुमारी परवान पर चढ़ती गई। फाइनल मुकाबले के आते आते तो लोग कॉमेंट्री सुनने के लिए अपने कान रेडियो से नहीं हटाते थे। उस वक्त भारत आस्ट्रेलिया (तीन मैच में से एक वेस्टइंडीज से) के अलावा किसी टीम से परास्त नहीं हुआ था। लेकिन फाइनल मुकाबले से पहले भी भारत वेस्टइंडीज को हरा चुका था। पर फाइनल में वेस्टइंडीज भारत को जबरदस्त तरीके से हराने के लिए मैदान में उतरा था और भारत को मामूली स्कोर 183 रन पर रोक दिया। पर टीम इंडिया में तब तक जीत का जोश और जुनून इतना भर चुका था कि उसे विजयद्वार पर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता था। वेस्टइंडीज के बल्लेबाज विवियन रिचड्र्स के आउट होने के बाद तो रुख ही पलट गया। इतने कम स्कोर के बावजूद भारत ने विश्वकप जीत लिया। भारत के जीतने के साथ ही भारतीय क्रिकेट प्रेमी अपना-अपना रेडिया सेट उठाकर नाचने-गाने लगे, जश्न मनाने लगे, बधाइयां देने लगे, पटाखे छोड़ें। चहुंओर दिवाली सा माहौल हो गया था। उस दिन को कभी नहीं भुलाया जा सकता। क्योंकि उस वक्त भारतीय क्रिकेटरों को बहुत ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती थीं। असल में भारतीयों में क्रिकेट का संक्रमण वहीं से फैलना शुरू हुआ था। 28 साल बाद 2 अप्रेल को एक बार फिर वही दिन दोबारा देखने को मिला, वैसा ही माहौल। सचमुच कैप्टन कूल महेन्द्र सिंह धोनी ने अपनी टीम को वैसे ही सजाया-संवारा और यह रोमांचक क्षण हर हिन्दुस्तानी को देखने का मौका दिया। जब धोनी इस टूर्नामेंट में नहीं चल रहे थे तो उनकी आलोचना होना शुरू हो गई थी। हालांकि समालोचक इस आलोचना को खुले में प्रदर्शित नहीं कर रहे थे। क्योंकि टीम इंडिया एक-एक टीम को हराकर आगे बढ़ रही थी। ऐसे में धोनी भले ही ना चले हों। समालोचक तो सोचकर बैठे थे कि टीम इंडिया के हारने के बाद धोनी पर अपनी भड़ास निकालेंगे। पर फाइनल मैच में धोनी ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके उनके अरमान दफन कर दिए। इस बात के लिए पूर्व कप्तान सौरव गांगुली को भी बधाई देनी चाहिए। क्योंकि टीम इंडिया में जीत की ज्वाला भरने वाले वो पहले कप्तान हैं। उनके नेतृत्व में 2003 में भारत विश्वकप फाइनल में पहुंची थी, भले ही हम जीत ना पाएं। पर वो लाजवाब थे। धोनी के पास फानइल मैच जीतने का खासा तजुर्बा था। दरअसल, हम भारतीयों में एक बहुत बुरी आदत हैं। हम कभी भी पूरी टीम पर भरोसा नहीं करते। हम सिर्फ गिनेचुने खिलाडिय़ों पर ही भरोसा करते हैं। विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग व मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के आउट होने से सबकी सोच बदल गई थी कि अब हम हार जाएंगे। क्या भारत ने अभी तक जितने भी मैच हैं, क्या सब उन्हीं की बदौलत जीते हैं? नहीं ऐसा नहीं है, क्रिकेट में हर गेंद पर दोनों टीमों को खतरा भी होता है और बेहतर मौका भी। क्रिकेट इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो कई बार ऐसा भी हुआ है जब टीम इंडिया के 8वें व 9वें विकेट ने जीत दिलाई है। रही भरोसे की बात तो इसी विश्वकप में पाकिस्तान से हुए सेमीफाइनल में युवराज सिंह पर हर कोई भरोसा कर रहा था। सब कह रहे थे कि पाक टीम के लिए तो युवराज अकेले ही काफी हैं। जब क्रीज पर युवराज आएं तो सभी तालियां बजा रहे थे। सबके चेहरे खिले हुए थे, लेकिन पहली ही गेंद पर आउट होने के साथ ही सबके चेहरों की रंगत उड़ गई। इसलिए कहते हैं कि यह क्रिकेट है। फाइनल में गौतम गंभीर अपनी नायाब पारी खेल रहे थे। सोचा था कि उनका शतक पूरा हो जाएगा। शतक से महज तीन रह दूर गंभीर आउट होकर पवैलियन लौट गए। फाइनल में जीतने के बाद जहां खिलाडिय़ों के चेहरे खुश नजर आने चाहिए थे, वहीं उनके नयनों से अश्रु झलक रहे थे। क्योंकि उस रोमांचक, यादगार व स्वर्णिम पल के दौरान सभी भावुक हो गए थे। धोनी के विजयी छक्का जडऩे से पहले सभी खिलाडिय़ों की आंखों के सामने अपनी की हुई कड़ी मेहनत, प्रभु से मांग गई मन्नत, घर से निकलने से पहले मां-बाप का आशीर्वाद और भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की आंखों में उन पर किया गया भरोसा इत्यादि दृश्य घूम रहे थे। इस खुशी के दौरान भारतीय क्रिकेटरों के नयनों से खुशी के आंसु निकलना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। (2 अप्रेल को टीम इंडिया के विश्वकप जीतने के बाद बेंगलूरु के 70 वर्षीय क्रिकेट प्रेमी संभवकुमार से बातचीत के आधार पर)

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