सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश

कर्नाटक की भाजपा सरकार ने सोमवार राज्य विधानसभा में विवादास्पद विश्वास मत के जरिए अपनी सरकार तो बचा ली। मगर, पता नहीं कर्नाटक की राजनीति कर्नाटक को किसी राह लेकर जाएगी। यहां जिस तरह की राजनीति हो रही है, उसे आम जनता देख रही है। कौन सही है और कौन गलत? इसका जवाब तो अगले विधानसभा चुनाव में मिल जाएगा। फिलहाल, राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने केंद्र को सौंपी रिपोर्ट में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की है। हालांकि, इस बात का अंदेशा पहले से ही जताया जा रहा था। हुआ भी यही। लेकिन एक बात को साफ हो गई है कि अगर इस दौर में राजनीति करनी है तो सारी हदें पार कर गरिमा को नीचा गिराना ही पड़ेगा। चाहे वो असंवैधानिक ही क्या ना है? भाजपा राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को हमेशा केंद्र में सत्तासीन कांग्रेस सरकार को एजेंट बताती आई है। प्रदेश कांग्रेस राज्यपाल को अपना आदमी समझकर अक्सर यही गुजारिश करते रहे हैं कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करवाएं। राज्यपाल के सिफारिश करने के बाद शारदीय नवरात्रि में उनकी यह मुराद भी पूरी हो गई। कांग्रेस अब यह भी देख रही है कि वह जनता दल (ध) के साथ गठजोड़ करके राज्य में अपनी सरकार बना लें। लेकिन उनका यह दाव कितना सफल होगा, यह भी वक्त आने पर पता चल जाएगा। लेकिन इस पूरे राजनीति घटनाक्रम से एक बात तो साफ हो ही गई है कि भाजपा, कांग्रेस व जद-ध सत्ता लोलुप हैं। चाहे किसी भी हद तक गुजरना पड़े। दूसरी तरफ यह भी देखने में आया है कि बार-बार भाजपा सरकार के कामकाज में राज्यपाल की दखलअंदाजी रही है। यानी, राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने अभी भी राजनीति मैदान नहीं छोड़ा है और हमेशा इस मैदान में बल्लेबाजी करने पर उतारू रहते हैं। राज्य विधानसभाध्यक्ष केजी बोपय्या ने 16 असंतुष्ट विधायकों को अयोग्य करार देने के बाद बीएस येड्डियूरप्पा की सरकार ने अशांतिपूर्ण माहौल में ध्वनिमत से विश्वास मत हासिल कर लिया। जिन विधायकों को सदस्यता के अयोग्य करार दिया गया, उनके सरकार के खिलाफ मतदान की संभावना थी। इधर, राज्यपाल भारद्वाज ने येड्डियूरप्पा सरकार के पक्ष में हुए विश्वास मत को कथित तौर पर असंवैधानिक करार देते हुए केंद्र को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की है। दिल्ली से मिली जानकारी के मुताबिक राज्यपाल की रिपोर्ट में भाजपा के 11 व 5 निर्दलीय विधायकों को विश्वास मत से पहले ही अयोग्य करार दिए जाने की विधानसभाध्यक्ष केजी बोपय्या की कार्रवाई को असंवैधानिक्य बताया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय का मानना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत या विश्वास मत से पहले भाजपा असंतुष्ट सदस्यों तथा निर्दलीय विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने का कोई मतलब नहीं था। वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने बताया कि राज्यपाल की रिपोर्ट पर विचार के लिए मंगलवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई जा सकती है। कांग्रेसियों के बाण झेलने के बाद विधानसभाध्यक्ष बोपय्या ने साफ तौर पर कहा कि येड्डियूरप्पा सरकार ने ध्वनि मत से विश्वास हासिल करने से पहले किसी ने भी मत विभाजन की मांग ही नहीं की। ऐसे में मत विभाजन का सवाल ही नहीं उठता था। नियमों का हवाला देते हुए कहा कि नियमनुसार ध्वनि मत से विश्वास मत हासिल किया गया। येड्डियूरप्पा ने कहा कि वह मंगलवार को दिल्ली में विराजित राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटील के समक्ष सभी विधायकों व मंत्रियों की परेड करवाएंगे। गौरतलब है कि अयोग्य करार दिए गए 16 विधायकों में से 8 जिनमें भाजपा के 3 और 5 निर्दलीय हैं, को हाल ही में राज्य नेतृत्व का विरोध करने के लिए मंत्री पर से हटा दिया गया था। 11 विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने के बाद भाजपा सरकार के विधायकों की संख्या घटकर 106 रह गई है। इसमें विधानसभाध्यक्ष भी शामिल हैं।

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