रविवार, 10 जुलाई 2011

दिल्ली बेली: बॉस डीके...

भारतीय समाज में प्राय: बकी जाने वाली गालियां (अश्लील भाषा) एक-दूसरे के बीच दूरियां बनाती हैं लेकिन जब यह गालियां अश्लील कॉमेडी के तौर पर सिनेमाई पर्दे पर दिखाई जाती है तो उसका विरोध किया जाता है। कोर्ट-कचहरी में याचिकाएं दायर की जाती हैं। यह कहां का इंसाफ है? जब सेंसर बोर्ड ने ही उस पर कैची नहीं चलाई तो किसी और को अंगुली उठाने का क्या हक है? फिल्म 'दिल्ली बेली' में ऐसा कुछ नहीं है जिसे हम नापसंद कर सकें। फिल्म में जिस गालियां बकी जाती हैं वो दर्शकों को हंसाने के साथ उनका मनोरंजन भी करती है। अगर ऐसा नहीं होता तो सैकण्ड वीक में भी 'दिल्ली बेली' को इतने दर्शक नहीं मिलते। बॉलीवुड में बहुत पहले से गालियों को प्रचलन शुरू हो गया था। इसी हफ्ते रिलीज 'मर्डर-2' में अभिनेता इमरान हाशमी को दो बार गाली बकता है। इस पर तो दर्शक तालियां व सीटियां भी बजा रहे हैं। डीके बॉस... को सिर्फ गीत ही रखना चाहिए। बड़े पर्दे पर उसी अश्लील भाषा का उपयोग किया जा रहा है, जो भारतीय समाज के लिए आम हो गई है तो ऐसे में यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विरुद्ध कैसे हो सकती है? वैसे भी 'दिल्ली बेली' समाज को आईना दिखाती है कि अश्लीलता भारतीय समाज से बहुत पहले ही घुलमिल गई है। इसलिए 'दिल्ली बेली' से समाज के किसी भी नुमाइंदे को कोई अश्लील भाषा नहीं सीख सकता। क्योंकि लगभग सभी इसमें परिपक्व हो चुके हैं। सिनेमाई पर्दे पर ऐसी बहुत सी गैर-जरूरी चीजें भी दिखाई जा रही हैं जिसका विरोध करने की किसी में हिम्मत नहीं। हम कह सकते हैं कि 'शूट आउट एट लोखेण्डवाला' फिल्म जब प्रदर्शित हुई थी तब अपराध जगत के कई लोगों ने उस फिल्म के एक्शनों का प्रशिक्षण लिया था। इसी अश्लील भाषा को देशभक्ति का रूप भी दिया गया है। निर्देशक जेपी दत्ता की सबसे बड़ी हिट फिल्म 'बोर्डर' में भी सन्नी देओल को देश के दुश्मनों को अश्लील भाषा में बात करते हुए दिखते हैं। जेपी दत्ता की निर्देशितएक और देशभक्ति फिल्म 'एलओसी' में तो इसकी भरमार थी। इसके बाद तो अश्लील भाषा फिल्मों की झड़ी लग गई थी। कई साल पहले आई 'बैण्डिक क्वीन' का तो सबको पता है। शायद फिल्मों के लिए हम कोई मापदंड तय नहीं कर सकते। हम इस मुद्दे को गौण नहीं कर सकते कि आज साफ-सुथरी फिल्मों को कोई पसंद नहीं करता है। यही कारण है कि ज्यादातर फिल्मों में अंग प्रदर्शन, अश्लील भाषा, मारधाड़ इत्यादि को तवज्जो दिया जा रहा है। ऐसे में 'स्टेनली का डब्बा' को दर्शक कहां से मिल पाएंगे? 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' क्या अपराध जगत को प्रेरित नहीं करती? अनीस बज्मी की 'रेडी' फिल्म की कामयाबी का मूल कारण यह है कि भारतीय समाज को एक पारिवारिक फिल्म की जरूरत थी। महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में आज भी रैगिंग होती है जिसे फिल्म '404' में साफ तौर दिखाया गया है। फिल्म 'रोड इन द सिटी' में पायरेसी किताब छापने के लिए मध्यम वर्ग के तीन नौजवान एक लेखक के साथ गैर-जरूरी बर्ताव करते हैं। शुक्र मानिए, सेंसर बोर्डका जिसने 'डबल धमाल' के कुछेक दृश्यों पर कैंची चलाई। वरना, इस फिल्म में मल्लिका शेरावत के जरिए क्या परोसा जाता यह स्वत: अंदाजा लगाया जा सकता है। साल 2007 में मनोज वाजपेयी अभिनीत फिल्म '1971' प्रदर्शित हुई थी, जो साधारण ढंग से फिल्माई जाने पर भी अद्वितीय बन जाती है। सच्चाई तो यही है कि हम अक्सर अच्छी फिल्मों को ठुकरा देते हैं और फूहड़ता की तरफ अग्रसर होते हैं। क्योंकि हम संदेशात्मक फिल्मों की अपेक्षा भी नहीं कर सकते।

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